डेस्क। शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri 2025) 22 सितंबर से शुरू हो गई है। यह पर्व शक्ति की आराधना और साधना का एक भव्य उत्सव है। माता दुर्गा की पूजा और आराधना का पावन पर्व नवरात्रि देश भर में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर देवी मंदिरों में भारी भीड़ उमड़ती है। उत्तर प्रदेश में देवी दुर्गा को समर्पित कई प्राचीन और पवित्र मंदिर हैं। विशेष रूप से, यहां के पांच शक्तिपीठ अत्यधिक पूजनीय माने जाते हैं और इनका उल्लेख देवी पुराण में भी मिलता है।
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नवरात्रि शारदीय—भारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध पर्व है। देश के अनेक हिस्सों में इसे दुर्गा पूजा और नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के इन नौ दिनों में भक्तगण घर या पंडालों में स्थापित माँ दुर्गा की प्रतिमा की विधिपूर्वक आराधना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो नवरात्रि के दौरान शक्तिपीठों की यात्रा करते हैं। इस महापर्व के मौके पर शक्तिपीठों की यात्रा एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। अगर आप भी नवरात्रि यात्रा की सोच रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए बेहद उपयोगी है। इस आर्टिकल में हमने उत्तर प्रदेश के प्रमुख शक्तिपीठों की जानकारी दी है, जहां आप इस वर्ष नवरात्रि के अवसर पर अपने परिवार के साथ यात्रा कर सकते हैं।
रामगिरि शक्तिपीठ-
चित्रकूट के रामगिरि में स्थित यह शक्तिपीठ पौराणिक महत्व रखता है। ऐसा माना जाता है कि यहां सती का दाहिना वक्ष गिरा था। यहां देवी की शिवानी नाम से पूजा की जाती है। नवरात्रि के दौरान इस मंदिर में बड़ी संख्या में भक्त आते हैं और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।
चित्रकूट के पवित्र दृश्य राम-सीता-लक्ष्मण तीनों की वनवास-यात्रा की गवाह हैं, खासकर तब जब वे अपने साढ़े ग्यारह वर्ष के समय को उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में बीताते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, इस अवधि में भगवान राम ने अपने माता-पिता और आचरण के अनुरूप धर्म-आचरण को सर्वोपरि रखते हुए वनवास का सामना किया। इसी स्थल पर स्थित एक शक्तिपीठ माना गया है, जहां माना जाता है कि भगवान राम ने पूजा-पाठ और आराधना की; जो उसे रामगिरि शक्तिपीठ के नाम से भी अलग पहचान देता है। अतः चित्रकूट न केवल एक ऐतिहासिक-धार्मिक स्थल है, बल्कि रामभक्ति की गहरी धारा से हर भक्त के दिल में एक विशिष्ट स्थान बनाता है।
श्री उमा शक्तिपीठ–
जब महादेव शिवजी की पत्नी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई। शिवजी जो जब यह पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया। बाद में शिवजी अपनी पत्नी सती की जली हुई लाश लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे। जहां-जहां माता के अंग और आभूषण गिरे वहां वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए।
वृंदावन में भूतेश्वर महादेव मंदिर के निकट स्थित यह शक्तिपीठ ‘उमा देवी मंदिर’ के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती के केश और पैर की अँगूठी गिरी थी। यह स्थान भक्तों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ वर्ष भर भक्त दर्शन के लिए आते हैं।
विशालाक्षी शक्तिपीठ-
वाराणसी में मणिकर्णिका घाट के निकट स्थित विशालाक्षी शक्तिपीठ, 51 शक्तिपीठों में अपना विशेष स्थान रखता है। देवी सती की मणिकर्णिका यहीं गिरी थी और वे विशालाक्षी तथा मणिकर्णी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। इस शक्तिपीठ से वाराणसी का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

पवित्र मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने सम्पूर्ण शक्तिपीठों पर साधना करके अपने विराट स्वरूप से काल भैरव को प्रकट किया था। ठीक इसी क्रम में काशी के पास भी काल भैरव का वास माना जाता है। माना जाता है कि 51 शक्तिपीठों में से एक है मां विशालाक्षी का दिव्य धाम, जो भक्तों को भक्ति, शक्ति और समृद्धि का आंचल प्रदान करता है। धार्मिक आस्था के अनुसार काशी में मां विशालाक्षी बाबा विश्वनाथ की पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ हर रात यहीं पर शयन करते हैं। काशी की जटिल, टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के बीच स्थित यह शक्ति पीठ श्रद्धालुओं के लिए एक तीर्थस्थल के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ हर दिन भारी संख्या में भक्त दर्शन के लिए जमा रहते हैं। यह पवित्र धाम भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में पहचाना जाता है, जहाँ देवी-देवताओं के दर्शनों के साथ-साथ भक्ति-भाव में डूबे निवासी अपने कर्तव्य और श्रद्धा के साथ मन की शांति पाने का अनुभव करते हैं।
पंचसागर शक्तिपीठ-
इस शक्तिपीठ का सटीक स्थान ज्ञात नहीं है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि यहाँ देवी सती की निचली दाढ़ गिरी थी। इसी कारण इस स्थान को वाराही शक्ति के नाम से जाना जाता है। पंचसागर मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह मंदिर खास तौर पर वाराणसी के मशहूर काशी विश्वनाथ मंदिर के पास ही मौजूद है, जिससे इसका धार्मिक महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यही कारण है कि वाराणसी को सदैव से आध्यात्मिक और धर्मनगरी के रूप में जाना जाता रहा है, और पंचसागर मंदिर इस विरासत का एक अहम हिस्सा है। यह मंदिर वाराणसी के पंचकोसी यात्रा मार्ग के एक प्रमुख बिंदु के तौर पर भी जाना जाता है। पंचसागर मंदिर की वास्तुकला प्राचीन शैली में निर्मित है। यह मंदिर आकार में बड़ा तो नहीं है, पर इसका आंतरिक और धार्मिक महत्व इसे विशेष बना देता है। गर्भगृह में देवी सती के प्रतीकात्मक दांत की पूजा विशेष रूप से की जाती है। नवरात्रि के अवसर पर, खासकर चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि के समय यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। इस समय मंदिर को आकर्षक रूप से सजाया जाता है और हवन-पूजन का आयोजन किया जाता है।
प्रयाग शक्तिपीठ-
संगम तट पर स्थित प्रयाग शक्तिपीठ का अत्यधिक महत्व है। मान्यता है कि यहाँ सती का हाथ गिरा था। प्रयागराज में तीन मंदिर – ललितादेवी, कल्याणीदेवी और अलोपीदेवी धाम – शक्तिपीठ माने जाते हैं। संगम में स्नान और इन मंदिरों के दर्शन-पूजन को मोक्षदायी माना जाता है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के ये पांचों शक्तिपीठ न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी अभिन्न अंग हैं। शारदीय नवरात्रि (Navratri) जैसे पर्व इन स्थानों की महिमा को और बढ़ा देते हैं। यहां दर्शन-पूजन करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें शक्ति एवं शांति प्राप्त होती है।


